मेरा नाम मनीष है । बात तब की है जब शादियों के दिन थे और शादी का माहौल था। मेरे साले की शादी थी और हम लोग ससुराल में इकठ्ठा हुए। काफ़ी लोग होने की वजह से हर कमरे में कई लोगों का इन्तजाम था। मेरी सलहज नाम है रुबिया , गोरा रंग, भरा हुआ
बदन, 34-26-34 के आकार , जवानी और सुन्दर।जब उसको देखता तो मेरा लंड खड़ा हो जाता था वह जब वह चलती तो साड़ी से वो अपनी मस्त और तनी हुई चूचियों को भरसक ढकती रहती
लेकिन बगल से, ब्लाऊज़ के मध्य दीखता रहता, झुकी हुई निगाहों से देखती और मुस्करा देती। मेरा लौड़ा और खड़ा हो जाता।
शाम के करीब 5 बजे थे और मैं मकान के ऊपर उसकी तरफ़ देखे जा रहा था कि तभी बोली- क्यों जीजाजी, क्या चाहिए?
मैंने जवाब दिया- अकेले तुम्हारे साथ ।
रात में एक कमरे में ऊपर पलंग पर मर्दों को सोने के लिए कहा गया और नीचे ज़मीन पर औरतों के लिए गद्दे लगाये गए।
पलंग के जिस किनारे पर मैं था, ठीक उसके नीचे पर सबसे पहले रुबिया का बिस्तर था। मन में बड़ी उतेजना हो रही थी,
मैंने सोच लिया कि आज नहीं चूकना, बस पहल कर ही देना।
मैंने सरला से पूछा- सरला, आज तुम्हारे ऊपर ही गिर जाऊ
वह आहिस्ते से बोली- आप मेरे ऊपर धीरे से आइयेगा ।
फिर क्या था, मैंने चादर तानी, और लेटे हुए सबके सोने का इंतज़ार करने लगा। रात कुछ गुजरी और थके हुए सभी लोग एक एक कर गहरी नींद में सो गए सिवाय मेरे और रुबिया के जो आज भड़क रहे थे
बाद में मै आहिस्ता से ऊपर पलंग के किनारे से उतर कर नीचे ज़मीन पर रुबिया के बगल में आ गया। कमरे में अँधेरा था। मैंने पहले उसकी चादर आहिस्ता से थोड़ी सी अपने ऊपर ले ली और अपने बदन को उससे सटाया, वह चुपचाप पड़ी रही और मेरी हिम्मत बढती गई । मैंने अपना हाथ धीरे से उसके कमर पर रखा और आहिस्ता से सरकाते हुए उसकी चूची पर रख दिया।
वह कुछ नही बोली।
मैंने अब उसकी चूची को सहलाने लगा ।वह बनकर शांत रही।और मैं मदहोश होने लगा,
लण्ड को मैंने उसकी पीछे से चिपका दिया और हाथ से दूसरी चूची को दबाने लगा।
वाह क्या मज़ा था और मैंने अपने हाथों से उसकी नाईटी को धीरे से ऊपर उठाया। अब मेरा हाथ उसके नग्न बदन पर था। और उसके नर्म नर्म बदन का मज़ा लेते हुए मैंने उसकी नंगी चूचियों को छुआ, गोल और एकदम सख्त लेकिन गरम। निप्प्ल को दबाया और कसकस कर अब मैं चूचियों को दबा रहा था, होठों से मैं उसकी गर्दन को चूमने लगा।
एक हाथ मैंने उसकी गर्दन के नीचे से घुसाकर उसकी तनी हुई चूची पर रखा और दूसरा हाथ मैंने सरकते हुए उसकी चूत पर रख दिया। चूत एकदम क्लीन शेव थी मखमली चिकनी लेकिन फिर भी एकदम गीली थी यानि चुदवाने के लिए तैयार। मैंने अपनी उंगली उसके बुर के दरार को छूते हुए अन्दर घुसा दी। उसने एक आह सी भरी, वो भी चुदवाने को एकदम तैयार थी।
उसके कान के पास मुँह ले जाकर मैंने फुसफुसाकर कहा- मैं बाथरूम जा रहा हूँ, तुम थोड़ी देर बाद आ जाओ रुबिया ।
आहिस्ता से उठकर मैं बाथरूम के अन्दर घुस गया और दरवाज़ा हल्का सा खुला रख इंतज़ार करने लगा।
पाँच मिनट बाद रुबिया आई और जैसे ही अन्दर घुसी मैंने दरवाज़ा बंद कर चिटकनी लगा दी।
अब क्या था, मैंने कस कर उसे अपनी बाँहों में भरा और अपने होठ उसके धधकते होठों पर रख ज़ोर से चूसने लगा।
क्या होंठ थे जैसे गुलाब की पंखुड़ियाँ। ऐसा स्वादिष्ट कि बस नशा छा गया।
एक हाथ से मैंने सिर पकड़ रखा था चूमते हुए और दूसरे हाथ से मैं उसकी चूचियों को नाइटी के ऊपर से ही मसल रहा था। मेरा लण्ड पजामे के अन्दर एकदम खड़ा हुआ परेशान हो रहा था। उत्तेजना होने से नंगा बदन ही अच्छा लगता है। मैंने तुंरत अपने पजामे का नाड़ा खोल उसे हटाया, अंडरवियर निकाल फेंका।
टीशर्ट उतार मैं नंगा हो गया, उसकी नाइटी के बटन को सामने से खोलना शुरू किया। जल्दी से उसके बदन से नाइटी हटाई, ब्रा के हूक को पीछे से खोला और चूमते हुए दबाते हुए, कस कस कर एक दूसरे को मसलते हुए पहले बेसब्री से उसकी नंगी आजाद चूचियों को हाथ में ले लिया। सख्त भी थी, नरम भी थी, गरम भी थी और गोल गोल भी थी।
क्या कहूँ, बस गज़ब की चूचियां थी, दबाओ तो बहुत बहुत मज़ा आए, गहरी गुलाबी रंग की निप्प्ल। बस एन्जॉय किया जा रहा था ।
वो अब भी पूरी तरह से नंगी नहीं थी, नायलॉन का कसा अंडरवियर उसकी बुर को छुपाये हुए था। उसे जब हटाया तो रुबिया शरमा गई और अपना मुँह मेरी छाती में छुपा लिया।
मेरा लंबा और फड़फ़ड़ाता हुआ लण्ड उसके बदन को चूत के आस पास छू रहा था। मैंने उसे पलकों के ऊपर चूमा, दीवार के सहारे अपने लण्ड को उसकी चूत के ऊपर दबाया, उसके होठों को चूसा और चूसता ही रहा।और उसकी चूची को निप्प्ल सहित अपने मुँह में भर लिया। उसकी दाहिनी चूची मसलते हुए उसकी बाईं चूची को मैं स्वाद ले लेकर चूस रहा था।
उसने एक हाथ से मेरी पीठ को अपनी तरफ़ दबा रखा था और दूसरे हाथ से मेरे लण्ड को अपने मुलायम हाथों से पकड़कर बोली- जीजाजी, जो भी करना है, जल्दी से कीजिये।
मैंने कस कर पकड़ तो रखा ही था, हम एक दूसरे के बदन से लिपट लिपट कर पता नहीं पागल हो रहे थे
बस कुछ न कुछ पकड़ा-पकड़ी, मसला-मसली, चूसा-चूसी चल रही थी।
मैंने भी देखा कि अब ज्यादा देर करने में रिस्क है, मैंने बाद में बाथरूम के फर्श पर मैंने रुबिया को लिटाया और उसके ऊपर चढ़ गया, टांगों को फैलाकर अपना लण्ड उसकी बुर पर रखा और घुसाया।थोडा सा उसको दर्द हुआ लेकिन वो सह गयी बाद में उसने भी थोड़ी सी मदद की और अपनी बुर से मेरे लण्ड को समेट लिया।
होंठ चूसते हुए, चूचियों को दबाते हुए मैंने चोदना शुरू किया।वह भी नीचे से गांड उठा उठा कर चुदवाने लगी।
चोदते हुए बीच बीच में मैं रुबिया की चूची को चूस भी रहा था। चुदाई लम्बी रखने के लिए मैंने स्पीड मध्यम ही रखी।चूची चूसते हुए और भी कम।
आख़िर में लण्ड ने जब सिगनल दिया कि अब मैं झड़ने वाला हूँ, तब मैंने कस कस कर चुदाई की, चोदता रहा, चोदता रहा, धकाधक ! धकाधक, धक्के पे धक्का ! धक्के पे धक्का ! लगता रहा।
और वो उछल उछल कर चुदवाए जा रही थी। ऐसा आनन्द आ रहा था कि मालूम ही नहीं पड़ा कि हम दोनों कब एक साथ झड़ गए। फिर थोड़ी देर बाद जल्दी से हमने कपड़े पहने और बाहर निकल गए